महिला सशक्तिकरण पर निबंध Mahila Sashktikaran Par Nibandh

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Mahila Sashktikaran Par Nibandh: Essay on Women Empowerment in Hindi इस पोस्ट में हम महिला सशक्तिकरण के विषय में निबंध प्रस्तुत किये हैं.

Mahila Sashktikaran Par Nibandh

महिला सशक्तिकरण निबंध के प्रकार

महिला सशक्तिकरण
स्त्री विमर्श: दशा और दिशा
महिला सशक्तिकरण: चुनैतियां और सम्भावनाएं
नारी सशक्तिकरण: दशा एवं दिशा
महिला मुक्ति किस ओर

महिला सशक्तिकरण पर निबंध Mahila Sashktikaran Par Nibandh

महिला सशक्तिकरण के सम्बन्ध में कही गयी उक्ति

“स्त्री पुरुष की गुलाम नहीं – सहधर्मिणी, अर्धांगिनी और मित्र है – महात्मा गाँधी

जिस समाज में नारी का स्थान सम्मानजनक होता है, वह उतना ही प्रगतिशील और विकसित होता है. परिवार और समाज के निर्माण में नारी का स्थान महत्वपूर्ण होता है. जब समाज सशक्त और विकसित होता है तो राष्ट्र भी मजबूत होता है. इस प्रकार राष्ट्र निर्माण में भी नारी केन्द्रित भूमिका निभाती है. माता के रूप में नारी प्रथम गुरु होती है. जार्ज हर्बर्ट के अनुसार “एक अच्छी माता सौ शिक्षक के बराबर होती है, इसलिए हर हालत में सम्मान करना चाहिए.”

भारतीय समाज में वैदिक काल में ही नारी का स्थान बहुत सम्मानजनक था और हमारा अखण्ड भारत बिदुसी नारियों के लिए जाना जाता था. परन्तु कालांतर में इनकी स्थिति में ह्रास हुआ और मध्य काल आते इनका ह्रास चरम पर जा पहुंचा. ब्रिटिश काल में भी नारी की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ. हाँ, परन्तु थोड़े बहुत प्रयास किये गए जिससे नारी की दशा सुधरे. आजादी के बाद नारी की स्थिति में सुधार के बहुत क़ानूनी प्रयत्न किये गए परन्तु समाजिक स्तर पर जो बदलाव आना चाहिए था वो बदलाव परिलक्षित नहीं हुआ, जिसका मुख्य करण रहा, हमारी पुरुष प्रधान मानसिकता, जिसे हम बदल नहीं पाये और नारी के प्रति हमारा रवैया दोयम दर्जे का रहा. यही कर्ण है की वैदिक काल में जी नारी शीर्ष पर थी आज उसके सशक्ति करण की आवश्यकता महसूस हुयी.

महिला सशक्तिकरण का मुद्दा ना केवल भारत में अपितु विश्व के सभी देशों में चिन्तनीय मुद्दा है. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 8 मार्च 1975 को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत की गयी. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनेक महिला सम्मेलनों का सफलतापुर्वक आयोजन किया गया है. महिला सशक्तिकरण की दिशा में वियना में मानवाधिकारों के विश्व सम्मलेन 1993 में महिला अधिकारों को मानवाधिकार के रूप में मान्यता मिली.

महिला सशक्तिकरण का अर्थ, महिलाओं को घर, परिवार, समाज व राष्ट्र में अपनी नैसर्गिक क्षमता, स्वतंत्रता व मुक्ति का बोध कराकर इतना सशक्त और सक्षम बनने की वे अपने जीवन में बराबर महिलाओं को वैधनिक, राजनितिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्टभूमि में स्वायत्तता व निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करना है. सच्चे अर्थ में लोकतंत्र तभी सार्थक हो सकता है जब महिला और पुरुष, राष्ट्रिय विकास के सभी क्षेत्रों में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का कथन है – “महिलाओं की स्थिति ही देश के विकास को सूचित करती है.” लेकिन भारत में आज भी महिलाएं समाजिक, आर्थिक और राजनितिक उत्थान की मुख्यधारा से जुड़ने में रुकवेंट महसूस करती है.

सहस्ताब्दी विकास लक्ष्य 2015 लिंग भेद की समानता के साथ महिला सशक्तिकरण को समर्पित है. सतत विकास के लक्ष्य भी महिला विकास से जुड़े हुए हैं. महिलाओं के लिए गुणवत्तायुक्त, तकनिकी, व्यवसायिक व रोजगारोन्मुखी शिक्षा का विकास करके उन्हें सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना व आत्मनिर्भर बनाना है. साथ ही महिला विकास से जुड़ी समस्याओं जैसे बाल विवाह, दहेज प्रथा, यौन शोषण, घरेलू हिंसा, कार्यस्थलों पर महिलाओं का शोषण जैसी समस्याओं को समाप्त करना है.

ऐसा नहीं है की भारत महिलाओं को सशक्त बनाने लिए प्रयास नहीं हुए. हमारे देश में बारी शक्ति को बल देकर महिलाओं का उन्नयन का प्रयास जारी है, किन्तु लैंगिक भेदभाव की प्रकृतियाँ सदैव आड़े आती रही. भारत में सैन्य क्षेत्र में वर्ष 1992 से जहाँ महिलाओं को कमिशन देने की शुरुआत हुई वहीं केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा महिलाओं को पंचायतों तथा स्थानीय निकायों में आरक्षण की व्यवस्था की जा चुकी है. भारतीय संविधान के माध्यम से भी महिलाओं को विभिन्न संविधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है. महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकार की तरफ से विभिन्न प्रयास किये गए हैं. महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए 9 सितंबर 2005 को पैतृक सम्पत्ति में बेटे के समान बेटी को अधिकार देने वाला कानून, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम – 2005, आदि पारित किये गए हैं. 31 जनवरी 1992 को “राष्ट्रिय महिला आयोग” का गठन किया गया जो महिलाओं के संवैधानिक तथा कानूनी सुरक्षा के अथिकारों को ठीक ढंग से लागू करता है. महिला हितों को ध्यान में रखकर ही 9 दिसंबर को भारत में बालिका दिवस मनाया जाता है.

वर्त्तमान समय में भी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए सरकार द्वारा स्किल इण्डिया, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इण्डिया, स्टेंडअप इण्डिया व दीन दयाल अन्योदय योजना, राष्ट्रिय ग्रामीण जीविकोपार्जन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना, बालिका सुकन्या समृधि योजना, उज्ज्वल योजना आदि जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं महिलाओं की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें राष्ट्रिय विकास व स्वालंबन के नए क्षितिज प्रदान कर रही है.

आज के आर्थिक युग में महिला सशक्तिकरण की धारणा से महिलाएं अथिक स्वावलंबी और आत्मनिर्भर हुई हैं. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत में महिलाओं का कुल कार्यबल उत्पादन में योगदान दे तो भारत की जी डी पी 27% बढ़ जाएगी. विश्व बैंक की रिपोर्ट के ही मुताबिक भारत में महिलाओं का श्रम कार्यबल 2011 में 24.6%, 2012 में 24.1%, 2013 में 24.2% और 2014 में 24.2% रहा है. महिलाओं की भागीदारी आर्थिक क्षेत्र में बढ़ाने के लिए सरकार लघु उधोग व स्वरोजगार स्थापना हेतु वित्तीय सहायता की व्यवस्था कर रही है.

महिला सशक्तिकरण की दिशा में काफी सुधर आया है किन्तु हमें यह भी ध्यान रखना होगा की लक्ष्य अभी दूर है. महिला सशक्तिकरण की बयार से अभी भी देश के सुदूरवर्ती ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्र अनछुए हैं. इक्कीसवीं सदी में हमें इस लक्ष्य को शत प्रतिशत प्राप्त करना है और इसके लिए कई कल्याणकारी योजनाओं को चलाना होगा. हमें देश की एक-दो नारी को ना केवल शिक्षित और जागरूक बनाना है बल्कि उनको आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से सम्मानजनक स्थिति तक लाना है.

बस्तुतः समाज में ऐसा वातावरण विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें महिला हिंसा पर रोक लगायी जाय. सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों से घर की चौखट की दहलीज से लेकर अंतरिक्ष तक जाने का रास्ता बनाया जाए. केवल शक्ति और अधिकार ही महिलाओं की मदद नहीं कर सकते. खुद को सशक्त बनाने के लिए उन्हें स्वयं भी कमर कसनी होगी.


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